पचमढ़ी बना बैतूल देखे नजारा इस वीडियो में

भाल नदी की ताल से जागता है यह गाँव आठनेर (प्रकाश खातरकर/मनोज देशमुख) इस भाग दौड़ भरी जिंदगी और देर रात तक शहरों की चकाकौंध में खोया इंसान की कल्पनाओं के बाहर भी एक जीवन है जिसे आने वाली और वर्तमान पीढ़ी शायद अब किस्से कहानियों में ही याद कर पाएंगी।खैर आज भी बैतूल जिले के सैकड़ो गाँव ऐसे है जहां लोग मुर्गो की बांग ,पक्षीयो के कलरव,और नदियों से बहते पानी की कलकल की आवाज से जागते है।आठनेर तहसील में भी ऐसे बहुत गाँव है मगर उन गावो में उतनी खूबी नही जो ग्राम भैसाघाट में है।चारो ओर पहाडियो से घिरे ,ऊंचे ऊंचे पेड़ो की सांय सांय , पक्षीयो के चहचहाहट,भाल नदी से बहते पानी की ताल पर जागने वाला यह गांव वास्तव में प्रकृति की गोद मे बसा है।इस कोरकू बाहुल्य गांव में लोग अलसुबह जागकर भाल नदी के शुद्ध जल में नहाकर अपनी दिनचर्या की शुरुवात करते है।कोई पहाड़ी नुमा खेतो की ओर जाते है, बच्चे भी नदी से नहाकर स्कूल जाने की तैयारी करते,महिलाये कपड़े और बर्तन भी नदी के किनारे साफ कर अपनी दिनचर्या की शुरुवात करती है।देखा जाए तो यह भाल नदी उनके लिए जीवन रेखा बनी हुई है।इसी नदी से कभी मछलियां तो कभी केकड़े पकाकर खाने में जीवन बसर करते यहां के लोगो को सब्जी भाजी की चिंता कीये बगैर हर समय उल्लासित देखा जा सकता है।अल्हड़ता से परिपूर्ण जीवन जीने के आदी यहां के लोग मोबाइल भी फक्त गाना सुनने के लिए इस्तेमाल करते है।रोजमर्रा की खबरों से बाख़बर रहने के लिए एक घर मे लगी टी वी से पड़ोस के आठ दस घर संतुष्ट हो जाते है।सूरज से समय का अंदाजा लगाने वाले बुजुर्ग भी बगैर लाठी के सहारे अपने पशुधन को ठीक समय पर घर लेकर आ जाते है।शाम के समय बच्चे भी स्कूल की छुट्टी के बाद प्रकृति द्वारा बिछाई गई हरी हरी नरम जाजम पर मस्ती करते हुए देखने मे देखने वाला भी खुद को रोक नही पाता।कुलमिलाकर जीवन और प्रकृति का भरपूर आनंद भैसाघट के लोग उठा रहे है।