क्या होती हैं बेटियां , जाने जिले की समाजसेवी और वरिष्ठ महिला पत्रकार की कलम से

क्या होती हैं बेटियां , जाने जिले की समाजसेवी और वरिष्ठ महिला पत्रकार की कलम से
बैतुल: बेटियों के पिता यूं तो बेटियों को पूरे भारत में लक्ष्मी का रूप मानते हैं। किसी के घर यदि बेटी जन्म भी लेती है तो यहीं कहा जाता है बेटी नहीं लक्ष्मी आई है। और बेटी यदि पहली हो तो इसे और भी शुभ माना जाता है। पर अपनी बेटी और पराई बेटी में सच कहूं फर्क बहूत होता है। इसे मानने या स्वीकार करने में भले ही सार्वजनिक मंच पर सभी एतराज करेंगे लेकिन सच यही है। कई दिनों से एक पीड़ा को बयां करने के लिये शब्द ही नहीं मिल रहे थे पर चिंतन और मंथन के बीच लगातार अंतर्द्वंद चल रहा था। आज सोचा चलो शुरुआत की जाए शायद भावनाओं को श्वेत पटल पर उधृत करने शब्द खुद-ब-खुद विन्यास पा लेंगे। शुरुआत मंशानुरूप ठीक-ठीक हो गई अब बारी उस पीड़ा की है वह किस स्वरूप में बाहर आएगी वह आगे के विन्यास से ही स्पष्ट होगा। बात बेटियों के पिता और उनके दूसरी बेटियों के प्रति आवभाव से शुरू करती हूँ। जिस दिन घर मे बेटी का जन्म होता है पिता को उसी पल से जिम्मेदारियों का दो गुना अहसास होने लगता है। अपनी बेटी को पहली बार गोद में लेना, उसका पहली बार उंगली थामना, पहली बार उसे घोड़ा बनकर सवारी कराना, उसका दौड़ना, भागना, गिरना, उठना, अटखेलिया, हँसी, ठिठोली, रूठना, पहली बार प..आ फिर पप्पा और फिर पापा कहना, स्कूल न जाने की जिद और फिर स्कूल जाने की उत्सुकता...पापा के लिये उनकी एंजल होती है बेटियां...बस यहीं रुक रही हूं.. और अपनी बात का रुख मोड़ रही हूं। अपनी बेटियों को एंजल मानने वाले पिता शायद इस बात को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे कि उनकी बड़ी होती, स्कूल के बाद कॉलेज और कॉलेज के बाद नौकरी या जॉब कर रही बेटी को कोई परिचित या अनजान व्यक्ति कुछ गलत कहें, उसके प्रति अपशब्द कहें। उनकी बेटी यदि अच्छा काम कर रही है तो उसे प्रोत्साहन मिले घर, पड़ोस, गांव, शहर और दोस्तों रिश्तेदारों के बीच जब कभी बात निकले भी तो उसकी तारीफ के शब्द ही लोग कहें..यह तो हर पिता चाहेगा लेकिन बिटिया पूरी मेहनत करें, उन्नति करें और ईमानदारी से कोई मुकाम हासिल करें तो पिता उस पर गर्व भी करेगा..पर यह गर्व सिर्फ एक पिता अपनी बेटी पर ही करता है.. यही सारे मुकाम आस पास रहने वाली कोई परिचित बेटी हासिल करती है तो बेटियों के पिता सन्देह क्यों करते हैं,,क्यों उसकी राह का रोड़ा बनने की कोशिश करते हैं...क्यों सामने उसकी सराहना और पीठ पीछे उसकी भर्त्सना करते हैं। आपके बिना मन के मैल वाले दो शब्द किसी बेटी का हौसला बढ़ा सकते हैं तो क्यों वह शब्द जबान पर नहीं आ पाते। ऐसी मानसिकता वाले कई बेटियों के पिताओ को मैं जानती हूं। उन्हें अब अपनी बड़ी होती बेटियों की चिंता कर लेनी चाहिए...कही कोई और बेटी का पिता उनकी बेटी के लिये मन मे कड़वाहट न घोल रहा हो। शायद मेरे ये शब्द कड़वे हो सकते हैं लेकिन सच तो कड़वा ही होता है... इसे पढ़कर भी यदि किसी बेटी पर उंगली उठाने का मन करें तो अपनी बेटी का ख्याल एक बार जरूर कर लेना।। गौरी बालापुरे पदम नोट: मौलिक विचार । कॉपी पेस्ट करें लेकिन बिना कांट-छांट के।